भारत की बदलती विदेश नीति: वैश्विक मंच पर उभरती एक नई शक्ति
सामरिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय कूटनीति के जरिए नई दिल्ली ने विश्व राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की

हाल के वर्षों में भारत की विदेश नीति में एक व्यापक और रणनीतिक बदलाव देखा गया है। भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। 'पड़ोसी पहले' की नीति से लेकर 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनने तक, नई दिल्ली ने अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को वैश्विक पटल पर स्पष्ट रूप से रखा है।
भारत की वर्तमान विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'सामरिक स्वायत्तता' है। अमेरिका के साथ बढ़ते रक्षा, व्यापार और तकनीकी सहयोग के बावजूद, भारत ने रूस के साथ अपने पारंपरिक और ऐतिहासिक संबंधों को कुशलतापूर्वक संतुलित रखा है। यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व में जारी तनावों के बीच, भारत ने लगातार शांति, संवाद और कूटनीति का मार्ग अपनाने का आह्वान किया है, जिसने इसे एक तटस्थ और विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है।
जी-20 की सफल अध्यक्षता के माध्यम से भारत ने विकासशील देशों की चिंताओं, जैसे कि ऋण संकट, जलवायु वित्तपोषण और खाद्य सुरक्षा को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में लाने का काम किया। इसके अतिरिक्त, क्वाड (QUAD) और ब्रिक्स (BRICS) जैसे समूहों में भारत की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि वह विभिन्न विचारधारा वाले गुटों के बीच एक पुल की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
आर्थिक मोर्चे पर, भारत अब कई देशों और क्षेत्रों, जैसे कि ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर चर्चा कर रहा है। इसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में भारत की भूमिका को बढ़ाना और विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करना है। हालांकि, चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी गतिरोध और पड़ोस में बदलती राजनीतिक स्थितियों जैसी चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने पर निरंतर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
